छोटे से गाँव मटकोला में रहने वाला गुल्लू बहुत शरारती लेकिन होशियार बच्चा था। उसे मशीनें खोलना, जोड़ना और नई चीज़ें बनाना बहुत पसंद था। उसके घर के बाहर खड़ी उसकी पुरानी लाल साइकिल उसकी सबसे प्यारी दोस्त थी।
लेकिन एक दिन गुल्लू ने आसमान में उड़ते पंछियों को देखकर कहा—
“काश मेरी गुल्लू की उड़ती हुई साइकिल भी बादलों के ऊपर उड़ पाती!”
उसकी दादी हँसकर बोलीं—
“अरे पगले, हवा में उड़ने के लिए जादू चाहिए!”
गुल्लू ने सोचा— अगर जादू नहीं है, तो जुगाड़ ही सही!
जुगाड़ का जादू शुरू
गुल्लू ने अपने छोटे टूलबॉक्स से पंखा, रॉकेट की खाली बोतलें, पुराने खिलौनों के पंख और पटाखों वाली तारें निकालीं।
उसने सबको जोड़कर अपनी साइकिल को एक नया रूप दिया।
अब वह साइकिल सच में अजीब लग रही थी—
पीछे दो बड़े पंख, आगे पंखे की ब्लेड और सीट के नीचे बोतलें!
गुल्लू बोला—
“बस! मेरी गुल्लू की उड़ती हुई साइकिल अब उड़ने के लिए तैयार है!”
पहली उड़ान का बड़ा दिन
गुल्लू अपनी नई साइकिल को लेकर खेतों के पास आया।
एक…
दो…
तीन…
उसने पंखे का स्विच दबाया और पैडल चलाने लगा।
पूरी साइकिल हिलने लगी।
धीरे-धीरे पहिये जमीन से ऊपर उठे…
और फिर—
वूहूऊऊऊऊऊ!!!
गुल्लू आसमान में उड़ गया!
गाँव वाले दंग रह गए।
सब चिल्लाने लगे—
“देखो! ये है गुल्लू की उड़ती हुई साइकिल!”
गुल्लू बादलों के बीच पहुँच गया।
नीचे पूरा गाँव छोटा-सा दिख रहा था।
उसने हाथ फैलाए और बोला—
“मैं तो सच का पायलट बन गया!”
मुसीबत का बादल
लेकिन अचानक काली हवा चलने लगी।
साइकिल डगमगाने लगी।
गुल्लू डर गया—
“ओहो! मेरी गुल्लू की उड़ती हुई साइकिल कहाँ ले जा रही है?”
तेज़ हवा साइकिल को एक बड़े पेड़ की तरफ धकेलने लगी।
गुल्लू ने हिम्मत लगाई, पंखे का स्विच बंद किया और पंखों को मोड़ दिया।
धीरे-धीरे साइकिल पेड़ की टहनी पर अटककर रुक गई।
गुल्लू पेड़ पर ही लटक गया!
गाँव वाले दौड़ते हुए आए और उसे बचा लिया।
सीख और नया फैसला
दादी ने गुल्लू को गले लगाया और बोलीं—
“बेटा, उड़ना बुरा नहीं… लेकिन बिना सोचे-समझे उड़ना खतरनाक है।”
गुल्लू मुस्कुराया—
“अब मैं अपनी गुल्लू की उड़ती हुई साइकिल को और सुरक्षित बनाऊँगा। एक दिन मैं सचमुच का वैज्ञानिक बनूँगा!”
और इस तरह गुल्लू की यह उड़ान उसके नए सपनों की शुरुआत बन गई।
Moral:
जो बच्चे सपने देखते हैं और मेहनत से कोशिश करते हैं, वे किसी दिन सचमुच आसमान छू लेते हैं।
