छोटे से गाँव में रहने वाली मीना बहुत ही जिज्ञासु बच्ची थी। उसे रोज़ नए-नए सवाल पूछना, चीज़ों को ध्यान से देखना और जंगल में खेलना बहुत पसंद था। एक दिन वह सुबह-सुबह जंगल में टहलने गई। सूरज की नरम रोशनी पेड़ों की पत्तियों पर पड़ रही थी और पूरा जंगल चमक रहा था।

चलते-चलते मीना एक बड़े, पुराने पेड़ के पास पहुँच गई। वह पेड़ दिखने में अलग था — उसका तना मोटा था और पत्तियाँ बहुत घनी। मीना ने पेड़ को ध्यान से देखा और बोली,
“अरे! तुम कितने सुन्दर हो… काश तुम बोल पाते!”

जैसे ही मीना ने ये कहा, पेड़ हिलने लगा। अचानक उसकी लकड़ी पर बनी आकृति जैसे मुस्कुराने लगी।
पेड़ ने धीमी-सी आवाज़ में कहा —
“मैं बोल सकता हूँ, मीना।”

मीना चौंक गई। उसने डरकर पीछे कदम रखा, लेकिन पेड़ बोला—
“डर मत, मैं तुम्हारा दोस्त हूँ।”

मीना की आँखें चमक उठीं।
“तुम सच में बोलते हो?!”

पेड़ हँसकर बोला,
“हाँ, लेकिन सिर्फ उन बच्चों से जो दिल से साफ़ होते हैं।”

मीना पेड़ के पास बैठ गई और दोनों बातें करने लगे। मीना ने पूछा—
“तुम हमेशा यहीं खड़े-खड़े कैसे रह लेते हो? बोर नहीं होते?”

पेड़ मुस्कुराया—
“मैं हवा के साथ झूमता हूँ, बारिश के साथ नहाता हूँ और पक्षियों की बातें सुनता हूँ। ये सब बहुत मज़ेदार होता है।”

मीना बोली—
“तो क्या मैं रोज़ आकर तुमसे बात कर सकती हूँ?”

“ज़रूर,” पेड़ ने कहा, “लेकिन बदले में एक वादा करना होगा।”

“कौन-सा वादा?”

पेड़ बोला—
“तुम हर महीने एक पौधा लगाओगी और उसकी देखभाल करोगी।”

मीना ने तुरंत हामी भर दी।
“पक्का! मैं बहुत सारे पौधे लगाऊँगी!”

पेड़ ने प्यार से अपनी पत्तियाँ हिलाईं, जैसे उसे आशीर्वाद दे रहा हो। उस दिन से मीना रोज़ उस पेड़ के पास जाती, बातें करती और नई-नई सीख लेकर लौटती।

कुछ दिनों बाद गाँव के लोग भी पेड़ लगाने लगे, और जल्द ही पूरा जंगल फिर से हरा-भरा हो गया।

मीना और बोलने वाला पेड़ अब जंगल की सबसे प्यारी दोस्ती की मिसाल बन गए।

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